ब्रह्मसूत्र का महत्त्व :: इसने उपनिषदों को एक दर्शन का रूप प्रदान किया। यह वेदान्त का संस्थापक बन गया। इसे वेदान्त का न्याय प्रस्थान कहा जाता है। यह वेदान्त की प्रस्थान त्रयी में अन्यतम है। यह सर्वशास्त्रीय ब्रह्मसूत्र है। काशकृत्स्न आदि के ब्रह्मसूत्र एक शाखीय थे और कुछ समय पश्चात् काल-कवलित हो गये। इसने बौद्ध धर्म और दर्शन के आक्रमणों से वैदिक दर्शन की रक्षा की। यह सर्वमान्य और सर्व प्रामाणिक है। शंकराचार्य (630 ई.), भास्कर (8वीं शती), यादव प्रकाश (11वीं शती), श्रीपति (14वीं शती), वल्लभ (14वीं शती), विज्ञानभिक्षु (16वीं शती) तथा बलदेव (18वीं शती) ने ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे।
11वीं शती से अठारहवीं शती तक ब्रह्मसूत्र का महत्त्व वैदिक या औपचारिक दर्शन की कसौटी के रूप में हो गया। जो दर्शन इस कसौटी पर खरा उतरे वह वैदिक दर्शन माना जाने लगा। इस कसौटी का तात्पर्य है कि ब्रह्मसूत्र के अनुसार होना ही किसी दर्शन की प्रामाणिकता है। उन्नीसवीं शती में रामानन्द सम्प्रदाय के अनुसार भी ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे गए, जिनमें आनन्द भाष्य, जानकी भाष्य तथा वैदिक भाष्य मुख्य हैं। वैदिक भाष्य की विशेषता यह है कि इसमें ब्रह्मसूत्र को वेद मंत्रों का संयोजन या समन्वय करने वाला सिद्ध किया गया है, न कि उपनिषद वाक्यों का। इनके अतिरिक्त आर्यमुनि (20वीं शती), हरप्रसाद (20वीं शती), राधाकृष्णन (20 वीं शती) आदि ने भी ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखे। ब्रह्मसूत्र के रचना काल से लेकर आज तक लगभग प्रत्येक शताब्दी में इस पर वृत्ति या भाष्य लिखे जाते रहे हैं। इन भाष्यों से ब्रह्मसूत्र का महत्त्व और अधिक बढ़ गया है।
ब्रह्मसूत्र छः दर्शनों का एक अंग है। इसके रचयिता बादरायण हैं। इसे वेदान्त सूत्र, उत्तर-मीमांसा सूत्र, शारीरक सूत्र और भिक्षु सूत्र आदि के नामों से भी जाना जाता है। वेदान्त के तीन मुख्य स्तम्भ हैं :- उपनिषद्, भगवदगीता एवं ब्रह्मसूत्र। इन तीनों को प्रस्थान त्रयी कहा जाता है। इसमें उपनिषदों को श्रुति प्रस्थान, गीता को स्मृति प्रस्थान और ब्रह्मसूत्रों को न्याय प्रस्थान कहते हैं। ब्रह्म सूत्रों को न्याय प्रस्थान कहने का अर्थ है कि ये वेदान्त को पूर्णतः तर्कपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करता है।
ब्रह्मसूत्र पर सभी वेदान्तीय सम्प्रदायों के आचार्यों ने भाष्य, टीका व वृत्तियाँ लिखी हैं। इनमें गम्भीरता, प्रांजलता, सौष्ठव और प्रसाद गुणों की अधिकता के कारण शांकर भाष्य सर्वश्रेष्ठ स्थान रखता है। इसका नाम शारीरक भाष्य है।
ब्रह्म ही सत्य है। "एकं एवं अद्वितीय" अर्थात वह एक है और दूसरे की साझेदारी के बिना है :- यह "ब्रह्मसूत्र" कहता है। वेद, उपनिषद और गीता ब्रह्मसूत्र पर कायम है। ब्रह्मसूत्र का अर्थ वेद का अकाट्य वाक्य, ब्रह्म वाक्य। ब्रह्मा को आजकल ईश्वर, परमेश्वर या परमात्मा कहा जाता है।
"एकं ब्रह्म द्वितीय नास्ति नेह ना नास्ति किंचन"
एक ही ईश्वर है दूसरा नहीं है। उस ईश्वर को छोड़कर जो अन्य की प्रार्थना, मंत्र और पूजा करता है वह अनार्य है, नास्तिक है या धर्म विरोधी है यथा :- जो एक ब्रह्म को छोड़कर तरह-तरह के देवी-देवताओं की प्रार्थना करता है, एक देवता को छोड़कर दूसरे देवता को पूजता रहता है अर्थात एक को छोड़कर अनेक में भटकने वाले लोग, जो मूर्ति या समाधि के सामने हाथ जोड़े खड़ा है, जो नक्षत्र तथा ज्योतिष विद्या में विश्वास रखने वाला है, जो सितारों और अग्नि की पूजा करने वाला है, जो सूअर, गाय, कुत्ते, कव्वे और साँप का माँस खाने वाला है, जो एक धर्म से निकलकर दूसरे धर्म में जाने वाली विचारधारा का है, जो शराबी, जुआरी और झूठ वचन बोलकर खुद को और दूसरों को गफलत में रखने वाला है, खुद के कुल, धर्म और परिवार को छोड़, दूसरों से आकर्षित होने वाले और झुकने वाले। नास्तिकों के साथ नास्तिक और आस्तिकों के साथ छद्म आस्तिक बनकर रहने वाले, जो जातियों में खुद को विभाजित रखता है और अपने ही लोगों को नीचा या ऊँचा समझता है, जो वेद और धर्म पर बहस करता है और उनकी निंदा करता है, वेदों की बुराई करने वाले और वेद विरुद्ध आचरण करने वाले, जो नग्न रहकर साधना करता है और नग्न रहकर ही मंदिर की परिक्रमा लगाता है, जो रात्रि के कर्मकांड करता है और भूत या पितरों की पूजा-साधना करता है, इत्यादि।
निंबार्क संप्रदाय :: निम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैत का दर्शन प्रतिपादित किया। निम्बार्क का प्रादुर्भाव 3096 ईसापूर्व (आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व) हुआ था। निम्बार्क का जन्म स्थान वर्तमान आँध्र प्रदेश में है। निम्बार्क का अर्थ है :- नीम पर सूर्य। मथुरा में स्थित ध्रुव टीले पर निम्बार्क संप्रदाय का प्राचीन मन्दिर बताया जाता है। इस संप्रदाय के संस्थापक भास्कराचार्य एक संन्यासी थे। इस संप्रदाय का सिद्धान्त 'द्वैताद्वैतवाद' कहलाता है। इसी को 'भेदाभेदवाद' भी कहा जाता है। भेदाभेद सिद्धान्त के आचार्यों में औधुलोमि, आश्मरथ्य, भतृ प्रपंच, भास्कर और यादव के नाम आते हैं। इस प्राचीन सिद्धान्त को 'द्वैताद्वैत' के नाम से पुन: स्थापित करने का श्रेय निम्बार्काचार्य को जाता है। उन्होंने 'वेदान्त पारिजात-सौरभ', वेदान्त-कामधेनु, रहस्य षोडसी, प्रपन्न कल्पवल्ली और कृष्ण स्तोत्र नामक ग्रंथों की रचना भी की थी। वेदान्त पारिजात सौरभ ब्रह्मसूत्र पर निम्बार्काचार्य द्वारा लिखी गई टीका है। इसमें वेदान्त सूत्रों की सक्षिप्त व्याख्या द्वारा द्वैताद्वैतव सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है।
सम्बन्धित दर्शन :: चंद्रकीर्ति, निम्बार्काचार्य, निंबार्क संप्रदाय, प्रमुख मीमांसक आचार्य, प्रस्थानत्रयी, बल्देव विद्याभूषण, बादरायण, भामती, भारत में दर्शनशास्त्र, भारतीय दर्शन, भाष्य, मध्वाचार्य, राधा कृष्ण, रामभद्राचार्य, शिवानन्द गोस्वामी, श्रीमद्भगवद्गीता, सांख्य दर्शन, संस्कृत ग्रन्थों की सूची, सूत्र, हिन्दू दर्शन, हिन्दू धर्मग्रन्थों का कालक्रम, हिंदू धर्म में कर्म, जगद्गुरु रामभद्राचार्य ग्रंथसूची, जैमिनि, वाचस्पति मिश्र, विज्ञानभिक्षु, वेदान्त दर्शन, आदि शंकराचार्य, आदि शंकराचार्य की कृतियाँ, अद्वैत वेदान्त, अध्यास, अप्पय दीक्षित, उत्तरमीमांसा, उपनिषद्।
बादरायण :: बादरायण वेदान्त के न्याय-प्रस्थान के प्रवर्तक ग्रन्थ ब्रह्मसूत्र के रचयिता थे। वाचस्पति मिश्र के समय में उन्हें व्यास की उपाधि दी गई। ब्रह्मसूत्र ने उपनिषदों को एक दर्शन का रूप प्रदान किया। वह वेदान्त का संस्थापक बन गया। ब्रह्मसूत्रों का अध्ययन करने से पता चलता है कि बादरायण प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द या श्रुति को प्रमाण मानते थे।
इसको वेदान्तसूत्र या शारीरिक मीमांसासूत्र भी कहा जाता है। इस समय जो ब्रह्मसूत्र उपलब्ध है, उसमें शंकराचार्य के अनुसार कुल 555 सूत्र हैं।
बादरायण ने अपने ब्रह्मसूत्र में जैमिनि, बादरि, काशकृत्स्न, कार्ष्णाजिनि, औडुलोमि, आश्मरथ्य तथा आत्रेय का उल्लेख किया है। ये सभी ब्रह्मसूत्रों के रचयिता थे। किन्तु इनके ब्रह्मसूत्र अब अनुपलब्ध हैं। इनमें से काशकृत्स्न का उल्लेख पतंजलि के महाभाष्य में भी मिलता है। आश्वलायन तथा कात्यायन के श्रौतसूत्रों में तथा बोधायन और भरद्वाज के गृह्यसूत्रों में भी इनमें से कुछ आचार्यों के नाम उल्लिखित हैं।
जैमिनि ने मीमांसासूत्र में तथा शाण्डिल्य ने भक्तिसूत्र में बादरायण का नामोल्लेख किया है।
बादरायण ने साँख्यमत, मीमांसामत, योगमत, वैशेषिकमत, बौद्ध सर्वास्तिवाद, बौद्ध विज्ञानवाद या शून्यवाद, जैनमत, पाशुपत मत तथा पांचरात्र मत का खंडन किया है। इससे निश्चित है कि वे बुद्ध के परवर्ती हैं।
बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर उपवर्ष ने जो पाणिनि के गुरु थे तथा बौधायन ने जिनकी परम्परा का उद्धार रामानुज ने किया था, वृत्तियाँ लिखी थीं, किन्तु ये वृत्तियाँ अब उपलब्ध नहीं है। उनके कुछ अंश परवर्ती वेदान्त और मीमांसा के साहित्य में उपलब्ध हैं।
गरुड़पुराण, पद्मपुराण, मनुस्मृति तथा हरिवंशपुराण में भी वेदान्तसूत्र का उल्लेख तथा संदर्भ है।
बादरायण नाम से स्पष्ट है कि वे बदर गोत्र में उत्पन्न हुए थे। बदर के ही गोत्र में बादरि भी उत्पन्न हुए थे। अत: कुछ लोग बादरि तथा बादरायण को अभिन्न समझते हैं। किन्तु स्वयं ब्रह्मसूत्र में ही बादरायण ने अपना नामोल्लेख बादरि से भिन्न करके किया है।
बादरायण का दर्शन :: इस समय बादरायण के ब्रह्मसूत्र पर अद्वैतमत, वैष्णवमत, शैवमत, शाक्तमत, तथा आर्य समाज मत के भाष्य उपलब्ध हैं। यही बात शैवमत के भाष्यों के बारे में भी निश्चयपूर्वक कही जा सकती है। वैष्णवमत के भाष्य बादरायण के मत के अनुसार नहीं हैं, क्योंकि बादरायण ब्रह्मवादी थे, न कि ईश्वरवादी (ब्रह्म और ईश्वर एक ही हैं)। वैष्णवमत ने विशिष्टाद्वैत, शुद्धाद्वैतवाद, द्वैतवाद या भेदाभेदवाद और अचित्य भेदाभेदवाद के दर्शनों का विकास किया है। इन भाष्यों में प्राय: शंकराचार्य के भाष्य के खंडन की प्रवृत्ति ही अधिक है (निम्बार्क के भाष्य को छोड़कर)। यादव प्रकाश का भाष्य और शुकभाष्य अनुपलब्ध है। भास्कर का भाष्य भी भेदाभेदवादी है। बादरायण का दर्शन अद्वैतवाद, भेदाभेदवाद और विशिष्टाद्वैतवाद में से ही एक है।
शंकराचार्य का भाष्य ही बादरायण के अभिमतों के सर्वाधिक निकट है। उनका दर्शन उपनिषदों के 'एकमेवाद्वितीय' सत् या ब्रह्म का ही प्रतिपादन करता है। शंकराचार्य के इस कथन को सभी भाष्यकार मानते हैं कि ब्रह्मसूत्रों का मुख्य प्रयोजन उपनिषद के वाक्यों को संग्रथित करना है। अत: बादरायण अद्वैतवादी थे।
ब्रह्म ::
अथातो ब्रह्मजिज्ञासा :- अब, इस प्रकार ब्रह्म जिज्ञासा करना है।
जन्माद्यस्य यत :- ब्रह्म वह है, जिससे इस जगत् का जन्म होता है, जिसमें इसकी स्थिति होती है तथा जिसमें इसका लय होता है।
शास्त्रयोनित्वात् :- ब्रह्म का ज्ञान शास्त्र से होता है।
तत्तु समन्वयात् :- वह ब्रह्मज्ञान शास्त्र के समन्वय से होता है। शास्त्र का समन्वय धर्म ज्ञान में नहीं है।
ईक्षतेनशिब्दम् :- ब्रह्म चेतन है। अत: वेदबाह्य प्रमाण अर्थात् प्रत्यक्ष तथा अनुमान से जगत् के आदि कारण की जो मीमांसा की जाती है, वह सत्य नहीं है।
अपबृंहणात् ब्रह्म :- जो फैलता जाता है उसे ब्रह्म कहते है।
बादरायण प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान तथा शब्द या श्रुति को प्रमाण मानते थे। किन्तु वे श्रुति विरोधी प्रत्यक्ष, अनुमान और उपमान को ग़लत समझते थे। अत: वे मुख्यत: श्रुतिवादी या वेदवादी थे। उनके अनुसार श्रुति अनुगृहीत तर्क ही मुख्य प्रमाण हैं, जिसके द्वारा ब्रह्म की जिज्ञासा की जानी चाहिए। दर्शन का स्वरूप मीमांसा है। श्रुतियों की तर्क संगत मीमांसा करना ही दर्शन है। दर्शन ब्रह्मविद्या है, क्योंकि श्रुतियों की मीमांसा का समन्वय उसी में है। पहले गुरु से ब्रह्म का श्रवण करना है, फिर उस श्रवण पर मनन करना है। मनन से ब्रह्मविद्या का निश्चय हो जाता है और अन्य दर्शनों का खंडन हो जाता है। अन्त में इस मनन पर निदिध्यासन करना है। निदिध्यासन आत्म साक्षात्कार रूप होता है। उसका अन्त आत्म त्याग में होता है। यही आत्म त्याग ब्रह्म प्राप्ति है। आत्मा ही ब्रह्म है। जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्म ही हो जाता है।
BRAHM SUTR ब्रह्मसूत्र santoshhindukosh.blogspot.com
(1). समन्वय) :: इसमें अनेक प्रकार की परस्पर विरुद्ध श्रुतियों और उपनिषद के वाक्यों का समन्वय किया गया है।