
पारद शिवलिंग
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
PtSantoshBhardwaj
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भारतीय आयुर्वेद और विशेष रूप से रसशास्त्र (Alchemy & Herbo-mineral metallurgy) में पारद (Mercury) और अभ्रक (Mica) को केवल साधारण धातु या खनिज नहीं, बल्कि सृष्टि की सर्वोच्च चेतना और ऊर्जा का भौतिक रूप माना गया है। रसग्रंथों के अनुसार, इन दोनों का संयोग आध्यात्मिक पूर्णता और भौतिक अमरता (देहवेध और लोहवेध) का आधार है।
रसशास्त्र में पारद और अभ्रक: शिव-शक्ति का दिव्य संयोग और पारद शिवलिंग का रहस्य और पारद और अभ्रक की भूमिका, शास्त्रीय श्लोक एवं भावार्थ :-
रसशास्त्र का संपूर्ण दर्शन शिव और शक्ति के मिलन पर टिका है। ग्रंथों में पारद को भगवान् शिव का अंश और अभ्रक को माता पार्वती का अंश माना गया है।
पारदस्य च पूजार्थं यस्य चेष्टा प्रवर्त्तते।
तस्य सर्वपापानि नाशं यान्ति न संशयः॥
जो मनुष्य पारद की पूजा, शोधन या उसकी उपासना के लिए तत्पर होता है, उसके समस्त जन्मों के पापों का तात्कालिक नाश हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है। पारद को 'रस' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह समस्त धातुओं को अपने भीतर समाहित (ग्रास) करने की क्षमता रखता है और शरीर को बुढ़ापे व मृत्यु से बचाता है।(रसार्णव)
अभ्रकस्तु भवेद् गौरया वीर्यं तु परिकीर्तितम्।
तदभावे न संसिद्धिः पारदस्य प्रजायते॥
अभ्रक को साक्षात् आदिमाया गौरी (पार्वती) का ओज कहा गया है। इसके बिना पारद की 'बन्धन' (स्थिरता) और 'मारण' क्रियाएं कभी सिद्ध नहीं हो सकतीं। पारे को यदि अचल और दिव्य बनाना है, तो अभ्रक का जारण (पारे को अभ्रक खिलाना) अनिवार्य है।(आयुर्वेद प्रकाश)
पारद-शिव और अभ्रक-शक्ति से सृष्टि का निर्माण :-
तंत्र और रसशास्त्र के अनुसार, यह दृश्यमान जगत शिव और शक्ति के स्पंदन का परिणाम है।
पारद (शिव अंश): पारद अत्यंत चंचल है, वह क्षण भर भी स्थिर नहीं रहता। यह चेतना (Consciousness) का प्रतीक है जो सर्वव्यापी है, परंतु बिना माध्यम के अक्रिय है।
अभ्रक (शक्ति अंश) :- अभ्रक (विशेषकर कृष्ण अभ्रक या वज्र अभ्रक) अग्नि को सहने वाली, स्थिर और ऊर्जा को थामने वाली महाशक्ति है।
जब पारद और अभ्रक का संयोग होता है, तो पारद की चंचलता समाप्त हो जाती है और वह स्थिर (बद्ध) हो जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से, जब आत्मा (शिव) और प्रकृति (शक्ति) मिलते हैं, तब ब्रह्मांड की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार, रसशाला में जब इन दोनों तत्वों को मिलाया जाता है, तो 'सृष्टि-निर्माण' की वही ऊर्जा एक लघु रूप में जाग्रत होती है, जो साधक को कल्याण और मोक्ष प्रदान करती है।
कृष्ण अभ्रक की जलहरी (अरघा) पर अष्ट संस्कारित स्वर्णिम पारद शिवलिंग की स्थापना का महत्व :-
सूतराजं समासाद्य गौरीबीजेन संपुतम्।
यः करोति सदा पूजां तस्य मुक्तिः करे स्थिता॥
यदि माता पार्वती के साक्षात् अंश कृष्ण वज्र अभ्रक से निर्मित अरघे (जलहरी) पर अष्ट संस्कारित पारद शिवलिंग (जो अपनी शुद्धता के कारण स्वतः स्वर्णिम आभा बिखेरता हो) को स्थापित किया जाए, तो वह स्थान साक्षात् मोक्ष दाता बन जाता है।
तांत्रिक क्रियाओं में अनिवार्यता और महत्व :-
ऊर्जा का संतुलन: पारद महा-ऊर्जा का उत्सर्जक (Emitter) है। कृष्ण अभ्रक संसार का सबसे उत्तम 'कंडक्टर' और 'इन्सुलेटर' माना जाता है। जब पारद शिवलिंग से तीव्र ऊर्जा निकलती है, तो अभ्रक की जलहरी उस दिव्य ऊर्जा को सोखकर ब्रह्मांड में बिखरने से रोकती है और उसे पुनः गर्भगृह में केंद्रित कर देती है।
तांत्रिक रक्षा कवच :- मारण, मोहन, उच्चाटन जैसी नकारात्मक तांत्रिक क्रियाएं या किसी भी प्रकार का अभिचार कर्म (काला जादू) उस घर में प्रवेश नहीं कर सकता जहाँ शिव-शक्ति का यह भौतिक युग्म स्थापित हो। यह तंत्र साधना की पराकाष्ठा है।
परिवार के कष्टों का हरण :- अष्ट संस्कारित पारद (जिसमें नाग, वंग, मल, चंचलता आदि दोष न हों) जब घर में रहता है, तो उसकी तरंगों से वास्तुदोष स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
रोग मुक्ति :- अष्ट संस्कारित पारद की आभामण्डल से ही असाध्य रोग शांत होने लगते हैं।
मानसिक शांति: परिवार के सदस्यों का क्रोध शांत होता है और आपसी सामंजस्य बढ़ता है।
यस्तु दोषमयं सूतं पूजयेद् वा प्रयच्छति।
स याति नरकं घोरं यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥
जो व्यक्ति अशुद्ध, दोषयुक्त या अन्य धातुओं से मिश्रित पारे के शिवलिंग की पूजा करता है या दूसरों को देता है, वह सूर्य और चंद्रमा के रहने तक घोर कष्ट भोगता है।(रसरत्नसमुच्चय)
अशुद्ध, दोषयुक्त या अन्य धातुओं से मिश्रित पारे के शिवलिंग की पूजा करने से काली शक्तियों का प्रभाव और आर्थिक हानि क्यों होती है?
राहु-केतु और शनि का वास: जस्ता, सीसा और रांगा जैसी धातुएं राहु, केतु और शनि की निम्नतम ऊर्जाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब पारे में इन्हें मिलाया जाता है, तो पारद अपनी सात्विकता खो देता है और 'तामसिक' तरंगें छोड़ने लगता है।
काली शक्तियों का आकर्षण: अशुद्ध और कज्जल (कालापन) छोड़ने वाला शिवलिंग घर में नकारात्मक ऊर्जा के भँवर (Negative Energy Vortex) का निर्माण करता है। इससे भूत-प्रेत, नजर दोष और तंत्र बाधाएं घर की ओर आकर्षित होती हैं।
आर्थिक विनाश :- जहाँ अशुद्ध पारद होता है, वहाँ अलक्ष्मी का वास हो जाता है। व्यापार में अचानक घाटा, कर्ज का बढ़ना, धन का बीमारी में बह जाना और दरिद्रता का आना निश्चित है, क्योंकि वह शिवलिंग नहीं, बल्कि एक भारी दोष बन जाता है।
सामर्थ्य न होने पर शास्त्रों की आज्ञा :- यदि किसी साधक के पास अष्ट संस्कारित शुद्ध पारद शिवलिंग और अभ्रक की जलहरी लेने का सामर्थ्य न हो, तो शास्त्र क्या कहता है?
दारिद्र्यात् पूजयेन्नात्र दोषयुक्तं रसेश्वरम्।
वरं पूजाविहीनत्वं न च पूजा अशुद्धके॥
दरिद्रता या धन की कमी के कारण कभी भी सस्ते और अशुद्ध पारद शिवलिंग को घर में लाकर पूजना नहीं चाहिए। इससे बेहतर है कि आप पारद शिवलिंग की पूजा ही न करें।(रसार्णव तंत्र)
उसके स्थान पर नर्मदेश्वर, स्फटिक या साधारण पाषाण (पत्थर) के शिवलिंग की पूजा कर लें, वह स्वीकार्य है, परंतु मिलावटी पारद घर में रखना अपने ही हाथों अपने विनाश को आमंत्रण देना है।
पारद और अभ्रक का मिलन अध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत संगम है। यदि साधना करनी हो, तो केवल और केवल प्रामाणिक, अष्ट संस्कारित और स्वर्णिम आभा युक्त पारद शिवलिंग की ही स्थापना कृष्ण अभ्रक की जलहरी पर करें। यह संयोजन साधक को भुक्ति (सांसारिक सुख, वैभव, लक्ष्मी) और मुक्ति (मोक्ष) दोनों एक साथ प्रदान करने में समर्थ है।
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
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